किसी भी व्यवसायिक स्थान का माहौल केवल सुंदर फर्नीचर, आकर्षक रंग या महंगे इंटीरियर से नहीं बनता। जब कोई ग्राहक दुकान या कार्यालय में प्रवेश करता है, तो सबसे पहले उसे वहाँ का वातावरण महसूस होता है। प्रवेश द्वार कैसा है, रोशनी पर्याप्त है या नहीं, काउंटर कितना व्यवस्थित है, मालिक कहाँ बैठता है और ग्राहक को आराम से आने-जाने की जगह मिल रही है या नहीं—ये सभी बातें मिलकर उस स्थान की पहली छाप बनाती हैं।
आपने भी देखा होगा कि कुछ पुरानी दुकानों में बिना किसी खास सजावट के भी ग्राहक सहज महसूस करते हैं और कुछ देर रुकना पसंद करते हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ आधुनिक दुकानों में सब कुछ होने के बावजूद माहौल भारी या असहज लगता है। वास्तु शास्त्र और सही स्पेस प्लानिंग इन्हीं बातों को अलग-अलग दृष्टिकोण से समझाने का प्रयास करते हैं।
यह बात हमेशा ध्यान रखें कि व्यवसाय में सफलता केवल वास्तु या दिशाओं पर निर्भर नहीं करती। मेहनत, अच्छे उत्पाद, ग्राहकों से व्यवहार, सही कीमत, उचित स्थान, प्रभावी मार्केटिंग, कर्मचारियों का सहयोग और नियमित अनुशासन ही किसी भी व्यवसाय की असली नींव होते हैं। वास्तु को इन सभी बातों के साथ एक सहायक व्यवस्था के रूप में देखा जाए, तो यह अधिक उपयोगी साबित हो सकता है।
चाहे कार्यालय हो या दुकान, स्थान की बनावट और व्यवस्था काम करने के माहौल को प्रभावित करती है। यदि प्रवेश द्वार के पास गंदगी हो, काउंटर पर कागज़ों का ढेर लगा हो, मालिक की सीट ऐसी जगह हो जहाँ हर समय व्यवधान बना रहता हो या ग्राहकों के चलने के लिए पर्याप्त जगह न हो, तो इसका असर पूरे व्यवसायिक वातावरण पर पड़ सकता है।
वास्तु का उद्देश्य किसी प्रकार का डर पैदा करना नहीं है। इसका सरल अर्थ यह है कि व्यवसायिक स्थान पर साफ़-सफाई, संतुलन, पर्याप्त रोशनी, खुलापन और व्यवस्थित वातावरण बना रहे। जो बातें आपके नियंत्रण में हैं, उन्हें सोच-समझकर व्यवस्थित करना ही सबसे महत्वपूर्ण कदम है।
कार्यालय और दुकान का वास्तु अलग क्यों माना जाता है?
कार्यालय और दुकान दोनों ही व्यवसायिक स्थान हैं, लेकिन दोनों की आवश्यकताएँ अलग होती हैं। कार्यालय में योजना बनाना, बैठकों का आयोजन, ग्राहकों से चर्चा, लेखा-जोखा, दस्तावेज़ों का प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच समन्वय अधिक महत्वपूर्ण होता है। इसलिए यहाँ मालिक का केबिन, रिसेप्शन, मीटिंग रूम, कार्यस्थल और फाइलों की व्यवस्था विशेष महत्व रखती है।
दूसरी ओर दुकान में ग्राहक सीधे प्रवेश करता है। वहाँ उत्पादों की सजावट, कैश काउंटर, स्टॉक की व्यवस्था, रोशनी, प्रवेश द्वार और भुगतान क्षेत्र का सही प्रबंधन अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। कई बार ग्राहक का पहला अनुभव ही यह तय कर देता है कि वह खरीदारी करेगा या नहीं।
मोबाइल की दुकान, किराना स्टोर, ज्वेलरी शोरूम, बुटीक, ब्यूटी पार्लर, कोचिंग सेंटर, क्लिनिक या रेस्तराँ—हर व्यवसाय की ज़रूरतें अलग होती हैं। इसलिए वास्तु के नियमों को बिना सोचे-समझे अपनाने के बजाय अपने व्यवसाय की प्रकृति के अनुसार उनका उपयोग करना अधिक समझदारी होती है।
हालाँकि कुछ बातें लगभग हर व्यवसायिक स्थान पर समान रूप से लागू होती हैं। जैसे प्रवेश द्वार साफ़-सुथरा रहे, उत्तर-पूर्व दिशा में अनावश्यक सामान न रखा जाए, मालिक या कैशियर की सीट स्थिर स्थान पर हो, कैश रखने का स्थान सुरक्षित हो और कहीं भी टूटी-फूटी या बेकार वस्तुएँ इकट्ठी न हों। यही बातें व्यवसायिक वास्तु की बुनियादी नींव मानी जा सकती हैं।
प्रवेश द्वार पर विशेष ध्यान दें
दुकान या कार्यालय का प्रवेश द्वार सबसे पहली छाप छोड़ता है। कई बार लोग अंदर की सजावट पर तो काफी खर्च कर देते हैं, लेकिन बाहर पुराने बैनर, धूल, फटे हुए मैट, टूटे बोर्ड या खाली डिब्बे पड़े रहते हैं। ग्राहक अंदर आने से पहले ही ऐसी चीज़ों को देखकर अपनी राय बना लेता है।
पारंपरिक वास्तु शास्त्र में उत्तर या पूर्व दिशा की ओर बना प्रवेश द्वार शुभ माना जाता है। उत्तर दिशा को धन और अवसरों से तथा पूर्व दिशा को नई शुरुआत और प्रगति से जोड़ा जाता है। लेकिन हर व्यवसायी के पास दिशा चुनने की सुविधा नहीं होती, विशेषकर किराए की दुकान या कार्यालय में। इसलिए दिशा बदलने के बजाय प्रवेश द्वार की साफ़-सफाई और आकर्षण पर ध्यान देना अधिक व्यावहारिक होता है।
प्रवेश द्वार के सामने कूड़ादान, टूटी कुर्सी, पुराने डिब्बे, बेकार स्टैंड, पानी का रिसाव या उलझे हुए बिजली के तार नहीं होने चाहिए। यदि दुकान मुख्य सड़क पर है, तो उसका बोर्ड साफ़ और दूर से पढ़ने योग्य होना चाहिए। केवल आकर्षक डिज़ाइन पर्याप्त नहीं है, ग्राहक को नाम स्पष्ट दिखाई देना भी ज़रूरी है।
कार्यालय में प्रवेश करते ही आने वाले व्यक्ति को यह समझ में आ जाना चाहिए कि रिसेप्शन कहाँ है। यदि रिसेप्शन किसी कोने में छिपा हो और आगंतुक असमंजस में खड़ा रहे, तो इससे कार्यालय की पेशेवर छवि प्रभावित होती है।
प्रवेश क्षेत्र में अच्छी रोशनी, साफ़ फर्श, स्पष्ट संकेत-पट्ट और थोड़ा खुला स्थान होना चाहिए। जगह छोटी होने पर भी प्रवेश द्वार को गोदाम या स्टोर की तरह उपयोग नहीं करना चाहिए।
उत्तर-पूर्व दिशा को साफ़ और खुला रखें
अक्सर दुकानों और कार्यालयों में उत्तर-पूर्व दिशा धीरे-धीरे कबाड़ रखने की जगह बन जाती है। पुराने डिब्बे, खराब सामान, टूटे डिस्प्ले, खाली पैकिंग बॉक्स और अनुपयोगी वस्तुएँ यहीं जमा होने लगती हैं।
वास्तु शास्त्र में उत्तर-पूर्व दिशा, जिसे ईशान कोण कहा जाता है, सकारात्मक ऊर्जा और प्रकाश का क्षेत्र माना जाता है। यदि धार्मिक मान्यता को अलग भी रख दें, तब भी यह समझना आसान है कि किसी भी व्यवसायिक स्थान का एक साफ़ और खुला हिस्सा पूरे वातावरण को अधिक व्यवस्थित और हल्का महसूस कराता है।
यदि इस दिशा में खिड़की हो, तो उसे हमेशा बंद न रखें। प्राकृतिक रोशनी किसी भी दुकान या कार्यालय को अधिक ताज़गी देती है। यदि खिड़की नहीं है, तो वहाँ अच्छी और संतुलित रोशनी की व्यवस्था की जा सकती है।
यदि पूजा का स्थान बनाना हो, तो उत्तर-पूर्व दिशा उपयुक्त मानी जाती है। लेकिन पूजा स्थल का अर्थ केवल मूर्ति रखना नहीं है। वहाँ धूल, पुराने फूल, राख, तेल के दाग या प्लास्टिक का कचरा जमा नहीं होना चाहिए। स्वच्छ और व्यवस्थित पूजा स्थान ही सकारात्मक वातावरण प्रदान करता है।
यदि आपकी दुकान छोटी है और दिशा का सही पता लगाना कठिन हो, तो कम से कम यह ध्यान रखें कि प्रवेश के आसपास का हिस्सा पूरी तरह साफ़ और व्यवस्थित रहे। ग्राहक के अंदर आते ही उसे भीड़भाड़ या अव्यवस्था का अनुभव नहीं होना चाहिए।
किसी भी व्यवसाय में सबसे महत्वपूर्ण स्थान मालिक या मुख्य निर्णय लेने वाले व्यक्ति की सीट होती है। जब व्यक्ति अपनी कार्यस्थली पर सहज और आत्मविश्वास के साथ बैठता है, तो उसका सकारात्मक प्रभाव निर्णय लेने की क्षमता और काम करने के तरीके पर भी दिखाई देता है।
वास्तु शास्त्र में दक्षिण-पश्चिम दिशा को स्थिरता और नेतृत्व का प्रतीक माना जाता है। इसलिए यदि संभव हो तो मालिक का केबिन या मुख्य कुर्सी इसी क्षेत्र में होनी चाहिए। बैठते समय उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख रखना शुभ माना जाता है।
हालाँकि हर कार्यालय या दुकान में यह व्यवस्था संभव नहीं होती। कई बार केबिन पहले से बना होता है, मेज़ की जगह सीमित होती है या बिजली और कंप्यूटर की वायरिंग के कारण स्थान बदलना आसान नहीं होता। ऐसी स्थिति में कम से कम इतना ध्यान रखें कि आपकी कुर्सी के पीछे मजबूत दीवार हो। इससे काम करते समय सुरक्षा और स्थिरता का अनुभव होता है।
यदि कुर्सी के पीछे दरवाज़ा, खुला रास्ता या पूरी तरह काँच हो, तो व्यक्ति बार-बार पीछे होने वाली गतिविधियों पर ध्यान देने लगता है। इससे एकाग्रता प्रभावित हो सकती है। कई दुकानों में कैशियर या मालिक इस तरह बैठते हैं कि उनकी पीठ प्रवेश द्वार की ओर होती है। ऐसे में हर ग्राहक के आने पर पीछे मुड़ना पड़ता है, जो लंबे समय तक असुविधाजनक साबित हो सकता है।
मालिक की मेज़ भी हमेशा व्यवस्थित होनी चाहिए। उस पर पुराने बिल, रसीदें, चार्जर, चाय के कप, बिखरे हुए कागज़ और अनावश्यक सामान का ढेर नहीं होना चाहिए। जिस स्थान पर महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते हैं, वहाँ साफ़-सफाई और व्यवस्था होना आवश्यक है।
कैश काउंटर को व्यवस्थित और सुरक्षित रखें
दुकान में कैश काउंटर वह स्थान होता है जहाँ ग्राहक की खरीदारी पूरी होती है। यदि भुगतान की प्रक्रिया तेज़ और सरल हो, तो ग्राहक का अनुभव भी अच्छा रहता है। लेकिन यदि इसी स्थान पर अव्यवस्था या अनावश्यक देरी हो, तो पूरी खरीदारी का प्रभाव कमजोर पड़ सकता है।
वास्तु शास्त्र में उत्तर दिशा को धन और आर्थिक प्रवाह से जोड़ा जाता है। इसलिए कई लोग कैश काउंटर को उत्तर दिशा के अनुसार व्यवस्थित करना पसंद करते हैं। कैशियर का उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठना भी शुभ माना जाता है। फिर भी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि काउंटर ग्राहकों की आवाजाही के अनुसार सुविधाजनक स्थान पर हो।
कैश काउंटर हमेशा साफ़ और व्यवस्थित होना चाहिए। यूपीआई क्यूआर कोड स्पष्ट दिखाई दे, कार्ड स्वाइप मशीन सही तरीके से काम करे, छुट्टे पैसे व्यवस्थित हों और बिलिंग से जुड़ा आवश्यक सामान आसानी से उपलब्ध रहे।
आज के समय में डिजिटल भुगतान व्यवसाय का सामान्य हिस्सा बन चुका है। कई दुकानों में क्यूआर कोड फटे हुए कागज़ पर चिपका होता है या ऐसी जगह लगा होता है जहाँ ग्राहक को स्कैन करने में परेशानी होती है। ऐसी छोटी-छोटी बातें भी ग्राहक के अनुभव को प्रभावित करती हैं।
नकदी रखने की दराज़ या लॉकर हमेशा सुरक्षित स्थान पर होना चाहिए। उसे खुले रूप में सभी के सामने नहीं रखना चाहिए। वास्तु अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन व्यवसाय में सुरक्षा उससे भी अधिक आवश्यक है।
रिसेप्शन कार्यालय की पहली पहचान होता है
कार्यालय में आने वाला हर व्यक्ति सबसे पहले रिसेप्शन को देखता है। इसलिए इसे केवल एक मेज़ और कुर्सी समझने की गलती नहीं करनी चाहिए। यदि रिसेप्शन पर कागज़ बिखरे हों, कर्मचारी मौजूद न हो, बैठने की उचित व्यवस्था न हो या दीवार पर पुराने कैलेंडर और खराब सजावट लगी हो, तो कार्यालय की पेशेवर छवि कमजोर पड़ जाती है।
वास्तु शास्त्र में उत्तर और पूर्व दिशा को रिसेप्शन के लिए उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि इन्हें संवाद और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। लेकिन दिशा से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि रिसेप्शन स्पष्ट रूप से दिखाई दे और वहाँ पहुँचने में किसी प्रकार की परेशानी न हो।
कार्यालय में प्रवेश करते ही आगंतुक को तुरंत समझ में आ जाना चाहिए कि उसे किससे संपर्क करना है। रिसेप्शन डेस्क पर केवल आवश्यक वस्तुएँ ही रखें। आगंतुकों के बैठने की व्यवस्था, पीने का पानी, कंपनी का नाम और पर्याप्त रोशनी जैसी छोटी-छोटी सुविधाएँ भी अच्छा प्रभाव छोड़ती हैं।
यदि कंपनी का लोगो रिसेप्शन की दीवार पर लगा हो, तो उसके आसपास दीवार टूटी हुई, गंदी या तारों से भरी नहीं होनी चाहिए। आने वाला व्यक्ति बिना कुछ कहे भी इन बातों पर ध्यान देता है।
छोटे कार्यालय में रिसेप्शन का आकार छोटा हो सकता है, लेकिन साफ़-सुथरा और व्यवस्थित होना अधिक महत्वपूर्ण है।
उत्पादों की सही सजावट बिक्री बढ़ाने में मदद करती है
खुदरा व्यापार में उत्पादों की प्रस्तुति का सीधा असर बिक्री पर पड़ता है। यदि ग्राहक को सामान आसानी से दिखाई नहीं देगा, तो कई बार वह उसके बारे में पूछेगा भी नहीं। इसलिए केवल अधिक स्टॉक रखना पर्याप्त नहीं है, उसे सही तरीके से प्रदर्शित करना भी आवश्यक है।
पारंपरिक वास्तु के अनुसार भारी रैक और अधिक वज़न वाला स्टॉक दक्षिण या पश्चिम दिशा में रखना बेहतर माना जाता है। वहीं उत्तर और पूर्व दिशा को अपेक्षाकृत खुला रखने की सलाह दी जाती है। व्यावहारिक दृष्टि से भी इससे दुकान अधिक खुली और व्यवस्थित दिखाई देती है।
जिन उत्पादों की बिक्री अधिक होती है, उन्हें ग्राहक की आँखों के स्तर पर रखें। अधिक लाभ वाले उत्पादों को ऐसी जगह रखें जहाँ ग्राहक की नज़र आसानी से पहुँच सके। भारी या कम बिकने वाले सामान को पीछे की ओर व्यवस्थित किया जा सकता है।
एक सामान्य गलती यह होती है कि दुकान में हर सामान एक साथ सामने रख दिया जाता है। इससे ग्राहक भ्रमित हो सकता है। किराना, कपड़ों, मोबाइल एक्सेसरीज़ या अन्य किसी भी व्यापार में उत्पादों को उनकी श्रेणी के अनुसार अलग-अलग रखना अधिक सुविधाजनक होता है।
धूल से ढके हुए या खराब पैकिंग वाले उत्पाद सामने नहीं रखने चाहिए। इससे ग्राहक को यह आभास हो सकता है कि सामान पुराना है और उसकी गुणवत्ता अच्छी नहीं होगी।
किसी भी कार्यालय में कर्मचारियों की बैठने की व्यवस्था केवल सुविधा का विषय नहीं होती, बल्कि यह उनके काम की गुणवत्ता और कार्यक्षमता को भी प्रभावित करती है। यदि कुर्सियाँ असुविधाजनक हों, मेज़ छोटी हो, बिजली के तार पैरों में उलझते हों, एसी की हवा सीधे चेहरे पर आती हो या कंप्यूटर स्क्रीन पर रोशनी पड़ती हो, तो काम पर ध्यान केंद्रित करना कठिन हो जाता है।
वास्तु शास्त्र में उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके काम करना शुभ माना जाता है। उत्तर दिशा को प्रगति और अवसरों से तथा पूर्व दिशा को नई ऊर्जा और एकाग्रता से जोड़ा जाता है। लेकिन हर कार्यालय में सभी कर्मचारियों को एक ही दिशा में बैठाना संभव नहीं होता। इसलिए दिशा से अधिक महत्व आरामदायक वातावरण, पर्याप्त जगह और सहज कार्य प्रवाह का है।
कर्मचारियों की कुर्सी के पीछे लगातार लोगों का आना-जाना भी एकाग्रता को प्रभावित कर सकता है। लेखा-जोखा संभालने वाले कर्मचारी को ऐसी जगह बैठाना बेहतर होता है जहाँ गोपनीय दस्तावेज़ सीधे आगंतुकों की नज़र में न आएँ। वहीं प्रबंधक की सीट ऐसी होनी चाहिए जहाँ से पूरी टीम पर आसानी से नज़र रखी जा सके, लेकिन कर्मचारियों को हर समय निगरानी का एहसास भी न हो।
यह भी याद रखें कि केवल बैठने की व्यवस्था बदल देने से वातावरण बेहतर नहीं बनता। कर्मचारियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार, सहयोग और अच्छा कार्य वातावरण भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
मीटिंग रूम का माहौल संतुलित रखें
मीटिंग रूम वह स्थान होता है जहाँ महत्वपूर्ण योजनाएँ बनती हैं, नए विचार सामने आते हैं और कई बार बड़े व्यावसायिक निर्णय लिए जाते हैं। यदि कमरा बहुत अंधेरा, बंद या घुटन वाला हो, तो चर्चा का माहौल भी प्रभावित हो सकता है।
वास्तु शास्त्र में उत्तर-पश्चिम दिशा को संवाद और गतिविधियों से जुड़ा माना गया है, इसलिए कई लोग मीटिंग रूम के लिए इसे उपयुक्त मानते हैं। पूर्व या उत्तर दिशा भी विचार-विमर्श के लिए अच्छी मानी जाती है।
मीटिंग रूम का फर्नीचर कमरे के आकार के अनुसार होना चाहिए। बहुत बड़े टेबल छोटे कमरे को और भी संकरा बना देते हैं। यदि व्हाइटबोर्ड या प्रोजेक्टर लगाया गया है, तो यह सुनिश्चित करें कि वह हमेशा उपयोग के लिए तैयार हो। मीटिंग शुरू होने के बाद तकनीकी समस्याएँ पेशेवर छवि को प्रभावित कर सकती हैं।
दीवारों पर आवश्यकता से अधिक पोस्टर या प्रेरणादायक संदेश लगाने के बजाय सीमित और सुसज्जित सजावट अधिक प्रभावशाली लगती है। कंपनी की उपलब्धियों या प्रमाणपत्रों के कुछ फ्रेम पर्याप्त होते हैं।
लेखा-जोखा और दस्तावेज़ों की व्यवस्था व्यवस्थित रखें
लेखा विभाग किसी भी व्यवसाय की रीढ़ माना जाता है। यहीं से यह पता चलता है कि आय कहाँ से आ रही है और खर्च किस दिशा में हो रहा है। इसलिए इस हिस्से को हमेशा व्यवस्थित रखना आवश्यक है।
महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों को कभी भी फर्श पर या इधर-उधर नहीं रखना चाहिए। बिल, जीएसटी से जुड़े कागज़, बैंक रिकॉर्ड, वेतन संबंधी दस्तावेज़ और अन्य आवश्यक फाइलों को अलग-अलग नाम वाले फ़ोल्डरों में सुरक्षित रखना बेहतर होता है। यदि संभव हो, तो सभी महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों का डिजिटल बैकअप भी रखें।
लेखा विभाग की मेज़ पर गोपनीय कागज़ खुले नहीं रहने चाहिए, विशेषकर यदि वहाँ ग्राहकों या आगंतुकों का आना-जाना रहता हो। कंप्यूटर स्क्रीन भी ऐसी दिशा में हो कि बाहरी व्यक्ति वित्तीय जानकारी न देख सके।
जहाँ नकदी और महत्वपूर्ण दस्तावेज़ रखे जाते हैं, वहाँ अत्यधिक शोर या भीड़भाड़ नहीं होनी चाहिए। शांत और सुरक्षित वातावरण वित्तीय कार्यों के लिए अधिक उपयुक्त रहता है।
लॉकर और तिजोरी की सही व्यवस्था
वास्तु शास्त्र में तिजोरी या लॉकर को दक्षिण, पश्चिम या दक्षिण-पश्चिम दिशा में रखना स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। यदि संभव हो तो उसका दरवाज़ा उत्तर या पूर्व दिशा की ओर खुलना शुभ माना जाता है।
हालाँकि केवल दिशा देखना ही पर्याप्त नहीं है। तिजोरी ऐसे स्थान पर होनी चाहिए जहाँ सुरक्षा की पूरी व्यवस्था हो। सीसीटीवी कैमरा, मजबूत ताला और सीमित लोगों की पहुँच जैसी बातें भी उतनी ही आवश्यक हैं।
यदि लॉकर नमी वाली दीवार के पास रखा गया हो, तो महत्वपूर्ण दस्तावेज़ खराब हो सकते हैं। इसलिए स्थान चुनते समय सुरक्षा और रखरखाव दोनों का ध्यान रखना चाहिए।
तिजोरी के ऊपर पुराने डिब्बे, बेकार सामान या टूटे हुए उपकरण नहीं रखने चाहिए। जहाँ धन और महत्वपूर्ण कागज़ रखे जाते हैं, वहाँ साफ़-सफाई और अनुशासन बनाए रखना बेहतर माना जाता है।
सही रोशनी व्यवसाय की छवि बदल सकती है
अक्सर लोग व्यवसायिक स्थान की रोशनी को अधिक महत्व नहीं देते, जबकि इसका प्रभाव ग्राहकों और कर्मचारियों दोनों पर पड़ता है। कम रोशनी में उत्पाद आकर्षक नहीं लगते और कार्यालय का वातावरण भी थका हुआ महसूस होता है। वहीं बहुत अधिक तेज़ रोशनी भी आँखों को असहज बना सकती है।
यदि उत्तर या पूर्व दिशा से प्राकृतिक रोशनी आती है, तो उसे अनावश्यक रूप से बंद नहीं करना चाहिए। दिन का प्राकृतिक प्रकाश दुकान या कार्यालय को अधिक जीवंत और सकारात्मक बनाता है।
हर व्यवसाय के अनुसार रोशनी का चयन अलग हो सकता है। ज्वेलरी शोरूम में केंद्रित प्रकाश की आवश्यकता होती है, कपड़ों की दुकान में ट्रायल मिरर के पास अच्छी रोशनी होनी चाहिए, किराना स्टोर में साफ़ और सफेद प्रकाश उपयुक्त रहता है, जबकि ब्यूटी पार्लर में ऐसी रोशनी होनी चाहिए जिससे चेहरे पर अनावश्यक छाया न पड़े।
दुकान या कार्यालय के किसी भी कोने को अंधेरा नहीं रहने देना चाहिए। ऐसे स्थानों पर धीरे-धीरे धूल और अनुपयोगी सामान जमा होने लगता है। साफ़, संतुलित और पर्याप्त रोशनी वाला वातावरण ग्राहकों पर अच्छा प्रभाव छोड़ता है।